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1951 से 1993 के बीच करीब 42 सालों के अंतराल में 7 ऐसे यादगार गीत आए, जिनकी जड़ें एक ही राग में थीं. हालांकि, उनकी धुनें, प्रस्तुति, शब्द, फिल्मी परिस्थितियां और भावनाएं अलग-अलग थीं. यही शास्त्रीय संगीत की खूबसूरती है कि एक ही राग कभी विरह बन जाता है, कभी प्रेम, कभी इंतजार तो कभी जीवन-दर्शन. इन सात धुनों में जान फूंकी है लता मंगेशकर, मो. रफी, किशोर कुमार और आशा भोसले ने… सात अलग-अलग अंदाज, सात अलग-अलग एहसास लेकिन वही राग. तो आइए, सुनते हैं सुरों का वह जादू, जो बार-बार लौटा और कभी पुराना नहीं हुआ…
नई दिल्ली. 1950 के दशक से लेकर 1990 के दशक तक हिंदी सिनेमा का संगीत लगातार बदलता रहा. कभी ऑर्केस्ट्रा का दौर आया, कभी गिटार और सिंथेसाइजर का तो कभी डिस्को की धुनों ने दर्शकों को झूमने पर मजबूर किया. लेकिन इन तमाम बदलावों के बीच एक ऐसी चीज भी थी जो समय के साथ कभी पुरानी नहीं हुई. भारतीय शास्त्रीय संगीत की बुनियाद. यही वजह है कि कई बार अलग-अलग दौर के संगीतकार, गीतकार और गायक अनजाने में एक ही राग की शरण में पहुंचे और ऐसे गीत रचे जो आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों में बसे हुए हैं.
चार दशक से ज्यादा लंबे इस संगीत सफर की सबसे दिलचस्प बात यह है कि एक ही राग ने हर दौर में नया रूप धारण किया. 1951 में जहां इसकी मिठास लता मंगेशकर की आवाज में सुनाई दी, वहीं 1960 के दशक में रफी और रोशन-मदन मोहन जैसे संगीतकारों ने इसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया. 1980 के दशक में आरडी. बर्मन ने उसी राग को आधुनिक ऑर्केस्ट्रेशन के साथ पेश किया, जबकि 1990 के दशक तक आते-आते राम-लक्ष्मण ने उसे नई पीढ़ी के स्वाद के अनुरूप ढाल दिया. यही, वजह है कि एक ही राग से जन्मे ये गीत अलग-अलग दौर की पहचान बन गए और आज भी उतने ही ताजा महसूस होते हैं.
इस सफर की शुरुआत 1951 में फिल्म नौजवान से हुई. गीत ‘ठंडी हवाएं लहरा के आए’ को लता मंगेशकर ने अपनी मधुर आवाज दी थी. साहिर लुधियानवी के लिखे इस गीत को एस.डी. बर्मन ने संगीतबद्ध किया. नलिनी जयवंत और प्रेमनाथ पर फिल्माया गया यह गीत आज भी हिंदी सिनेमा के सबसे सुरीले रोमांटिक गीतों में गिना जाता है. उस दौर में जब फिल्म संगीत अपनी आधुनिक पहचान बना रहा था, तब इस गीत ने शास्त्रीयता और लोकप्रियता का अनूठा संगम पेश किया. ठंडी हवाओं, जवानी और प्रेम की भावना को बयां करने वाला यह गाना आज भी क्लासिक माना जाता है.
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मदन मोहन का संगीत अपने आप में एक मुकाम है. 1964 में आई फिल्म ‘आप की परछाइयां’ का गीत ‘यही है तमन्ना, तेरे दर के सामने’ सुप्रिया चौधरी और धर्मेंद्र पर फिल्माया गया था. गीतकार राजा मेहदी अली खान ने इसे दुआ और इंतजार जैसे अहसासों से सराबोर किया. मोहम्मद रफी साहब की आवाज में यह गीत वही राग होते हुए भी बिल्कुल अलग मिजाज लिए हुए है. रफी की गायकी ने इस राग की कोमलता को नए अंदाज में पेश किया. यही वजह है कि यह गीत आज भी उनके बेहतरीन नगमों में शुमार किया जाता है.
1966 में संगीतकार रोशन ने इस धुन को फिर अपनाया. फिल्म ‘ममता’ का गीत ‘रहें न रहे हम, महका करेंगे’. लता मंगेशकर की आवाज और मजरूह सुल्तानपुरी के शब्दों ने अमर प्रेम की ऐसी तस्वीर बनाई, जो दशकों बाद भी श्रोताओं के दिलों को छूती है. संगीतकार रोशन ने इस गीत में राग की आत्मा को बरकरार रखते हुए उसे बेहद भावपूर्ण रूप दिया. सुचित्रा सेन और अशोक कुमार पर फिल्माया गया यह गीत आज भी रेडियो और मंचों पर बराबर सुना जाता है.
समय बदला और 1980 का दशक आया. फिल्मों की भाषा, संगीत और दर्शकों की पसंद में बड़ा बदलाव दिखाई देने लगा. लेकिन इस बदलाव के बीच भी शास्त्रीय रागों का आकर्षण कम नहीं हुआ. 1981 में फिल्म ‘नरम-गरम’ का गीत ‘हमें रास्तों की जरूरत नहीं है’ सामने आया. आशा भोसले की आवाज, गुलजार के शब्द और आर.डी. बर्मन का संगीत इस बात का प्रमाण थे कि एक ही राग को आधुनिक संवेदनाओं के साथ भी ढाला जा सकता है. गुलजार के गीत और स्वरूप संपत-अमोल पालेकर की फिल्म में पंचम ने गाने को आधुनिक और हल्का-फुल्का टच दिया.
1983 में आरडी. बर्मन ने दोबारा इसी छंद का इस्तेमाल किया. फिल्म ‘अगर तुम ना होते’ में किशोर कुमार और लता मंगेशकर की जोड़ी में ‘हमें और जीने की चाहत न होती’. गुलशन बावरा के बोलों और राजेश खन्ना-रेखा की फिल्म में यह गाना सुपरहिट रहा. पंचम दा ने इसमें रोमांस और दर्द दोनों को खूबसूरती से पिरोया. ये गाना फिल्म में मेल औप फीमेल दोनों वर्जन में है.
1985 में आरडी. बर्मन ने एक बार फिर इसी राग के रंग को नए अंदाज में पेश किया. फिल्म सागर का गीत ‘सागर किनारे, दिल ये पुकारे’ रोमांस, ताजगी और मधुरता का प्रतीक बन गया. किशोर कुमार और लता मंगेशकर की जुगलबंदी, जावेद अख्तर के शब्द और ऋषि कपूर-डिंपल कपाड़िया की स्क्रीन केमिस्ट्री ने इस गीत को यादगार बना दिया. फिल्म में यह गाना समुद्र किनारे की रोमांटिकता का प्रतीक बन गया. पंचम ने इसमें वेव्स और प्रकृति का एहसास भर दिया.
इसी राग का सातवां गाना 1993 में आया, जब फिल्म ‘प्यार का तराना’ का गीत ‘कहा था जो तुमने, क्यों मैंने ये माना’ रिलीज हुआ. लता मंगेशकर की आवाज, एमजी. हशमत के बोल और राम-लक्ष्मण का संगीत उस दौर की नई पीढ़ी को उसी शास्त्रीय विरासत से जोड़ रहा था, जिसने चार दशक पहले अपनी यात्रा शुरू की थी. लता मंगेशकर ने अपने करियर के इस दौर में भी वही जादू बरकरार रखा.
इन सात गीतों को साथ रखकर देखा जाए तो एक दिलचस्प तस्वीर सामने आती है. यहां सात अलग-अलग फिल्में हैं, सात अलग परिस्थितियां हैं, अलग-अलग संगीतकार, गीतकार और गायक हैं, लेकिन उनकी आत्मा एक ही राग से जुड़ी हुई है. यही भारतीय शास्त्रीय संगीत की सबसे बड़ी ताकत है. एक राग अपने भीतर अनगिनत भावों को समेटे रहता है और हर संगीतकार उसे अपनी कल्पना के अनुसार नया रूप दे सकता है. लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी, किशोर कुमार और आशा भोसले जैसे दिग्गज गायकों ने अपने-अपने अंदाज में इस राग को स्वर दिए. वहीं, एसडी. बर्मन, मदन मोहन, रोशन, आरडी. बर्मन और राम-लक्ष्मण जैसे संगीतकारों ने साबित किया कि शास्त्रीय संगीत किसी एक दौर का नहीं, बल्कि हर दौर का साथी है.


