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Bollywood cult Hit Movies: ‘जिंदगी जीने के दो ही तरीके होते हैं. एक तो जो हो रहा है, होने दो, बर्दाश्त करते जाओ, दूसरा बदलने की कोशिश करो’, ‘लिख रहा हूं मैं अंजाम, कल जिसका आगाज आएगा, मेरे लहू का हर एक कतरा, इंकलाब लाएगा’ ये बॉलीवुड की उस कल्ट हिट मूवी के डायलॉग हैं जिसने हमारे देश की युवाओं की सोच को बदला. युवाओं की सोच को क्रांतिकारी से जोड़ने में अहम भूमिका निभाई. इस फिल्म ने युवा दिलों को बखूबी समझा. उन्हें समाज में बहुत लाने के लिए प्रेरित किया. युवाओं की सोच बदलने और जनमानस में क्रांति लाने वाली इस फिल्म को सबने फ्लॉप समझा था. स्टार्स ने प्रोड्यूसर्स को फीस भी लौटा दी थी. जब फिल्म रिलीज हुई तो इतिहास रच दिया. फिल्म ने पूरे 49 अवॉर्ड जीते. मूवी मैसिव हिट रही.
कुछ फिल्मों की कहानी लोगों की सोच बदल देती है. इन फिल्मों को देखने के बाद मन में कई तरह के सवाल उमड़ने-घुमड़ने लगते हैं. कुछ कर गुजरने की ललक मन में पैदा होती है. 19 साल पहले ऐसी एक मूवी बॉक्स ऑफिस पर रिलीज हुई थी जिसने आंदोलन का स्वरूप धारण किया. युवाओं को सोच को क्रांतिकारी स्वरूप प्रदान किया. इस मूवी ने 49 अवॉर्ड जीते थे. नेशनल अवॉर्ड-फिल्मफेयर अवॉर्ड जीते. सबसे दिलचस्प फैक्ट यह है कि फिल्म को फ्लॉप समझा गया था. फिल्म के रिलीज होने से पहले इसमें काम करने वाले कई स्टार्स ने प्रोड्यूसर को फीस लौटा दी थी. जब मूवी रिलीज हुई तो इतिहास रच दिया. हम 26 जनवरी 2006 में रिलीज हुई फिल्म ‘रंग दे बसंती’ की बात कर रहे हैं. आइये जानते हैं इससे जुड़े दिलचस्प फैक्ट्स…..
देशभक्ति से प्रेरित आपने कई फिल्में देखी होगीं लेकिन ‘रंग दे बसंती’ में अंग्रेजों या फिर सरहद की लड़ाई नहीं बल्कि बिल्कुल ही अलग तरह की कहानी दिखाई गई थी. फिल्म में दिखाया गया कि कैसे देश के युवाओं की सोच क्रांतिकारियों से मिलती है. फिल्म को रिलीज हुए 20 साल से ज्यादा का वक्त हो चुका है लेकिन यह मूवी आज भी उतनी ही फ्रेश लगती है. भ्रष्टाचार, सिस्टम से परेशान युवाओं के दिल में यह फिल्म हमेशा जगह बनाए रखेगी. ‘रंग दे बसंती’ फिल्म का राकेश ओम प्रकाश मेहरा ने डायरेक्ट किया था. डायलॉग-गाने प्रसून जोशी ने लिखे थे. स्क्रीनप्ले कमलेश पांडेय और राकेश ओम प्रकाश मेहरा का था. फिल्म में आमिर खान, शरमन जोशी, सिद्धार्थ, कुणाल कपूर, सोहा अली खान, आर. माधवन लीड रोल में थे.
‘रंग दे बसंती’ में म्यूजिक एआर रहमान का था. म्यूजिक ब्लॉकबस्टर था. दिल में जोश जगाने वाले गाने प्रसून जोशी ने लिखे थे. फिल्म में कुल 10 गाने थे. इसमें फिल्म का टाइटल सॉन्ग ‘रंग दे बसंती’ और ‘लुकाछिपी’, ‘मस्ती की पाठशाला’ और ‘खलबली’ सबसे यादगार माने गए. ‘लुकाछिपी’ गाना आज भी आंखों में आंसू ला देता है. इस गाने को लता मंगेशकर ने गाया था.
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‘रंग दे बसंती’ को 600 स्क्रीन पर रिलीज किया गया था. फिल्म में 6 युवाओं की कहानी दिखाई गई थी. सभी युवा स्वतंत्रता सेनानियों पर डॉक्यूमेंटरी बनाने आई एक ब्रिटिश महिला (एलिस पैटन) की मदद करते हैं. फिर उनकी पर्सनल लाइफ में कुछ ऐसा होता है कि भ्रष्टाचार को लेकर उनके मन में सिस्टम के खिलाफ गुस्सा पनपने लगता है. इस फिल्म की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आईएमडीबी पर इसे 8.1 की रेटिंग मिली हुई है.
‘रंग दे बसंती’ ने एक्ट्रेस सोहा अली खान को नई पहचान दी. सोहा अली ने बैंकर की नौकरी छोड़कर एक्टिंग की राह चुनी थी. एक्ट्रेस सोहा अली खान ने अपने एक इंटरव्यू में बताया था कि हर किसी को लगा था कि फिल्म एक बड़ी डिजास्टर साबित होगी. फिल्म के प्रमोशन के दौरान अचानक प्रोड्यूसर ने फीस लौटाने का अनुरोध किया. सभी एक्टर्स ने फीस लौटा दी मगर जब मूवी रिलीज होते ही एक आंदोलन बन गई. हर कोई फिल्म की सफलता से हैरान रह गया. यह सिनेमैटिक मास्टरपीस बन गई.
सोहा ने फिल्म की शूटिंग के अनुभव को साझा करते हुए बताया था कि देश के अलग-अलग हिस्सों में पूरे एक साल तक फिल्म की शूटिंग हुई. कई बार तो सही शॉट लेने के लिए आधे-आधे दिन का समय लग जाता था. फिल्म के सिनेमैटोग्राफर बिनोद प्रधान ने हर शॉट के परफेक्शन पर ध्यान देते थे. वो सेट पर एक्टर्स को घंटों इंतजार करवाते थे. उनकी मेहनत रंग लाई. फिल्म के यही शॉट ही कालजयी साबित हुए. फिल्म रील से रियल बन गई. दर्शकों पर अमिट छाप छोड़ने में कामयाब रही.
आमिर खान ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि उन्होंने ‘रंग दे बसंती’ फिल्म में एक सीन बहुत खराब किया था लेकिन लोग उसे बहुत अच्छा समझते हैं. आमिर ने कहा था, ‘मैं जहां भी जाता हूं तो लोग कहते हैं कि वो आम खाने का सीन बहुत अच्छा था. मुझे यह सुनकर बहुत कोफ्त होती है. सच्चाई यह है कि यह सीन मुझसे हुआ ही नहीं. उस वक्त मुझे बहुत सीख मिली. वो यह कि हमें क्रिएटिविटी को महत्व देना चाहिए. सीन के लिए तैयार होना जरूरी है, भले ही दो दिन चले जाएं.’
डायरेक्टर राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने अपने एक इंटरव्यू में बताया था कि फिल्म बनाते समय हमें बहुत मजा आ रहा था. मुझे स्क्रीनप्ले राइटिंग नहीं आती थी. फिल्म बनाने की कला का यह अहम प्वॉइंट है. गुलजार ने मुझे स्क्रिप्ट लिखना सिखाया. ‘रंग दे बसंती’ में भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, बिस्मिल सब थे. 2006 में और तरह के युवा थे. करियर माइंड और बहुत ही रियलिस्टिक थे. हमें फिल्म में जज्बा चाहिए था. इसलिए मैंने ‘रंग दे बसंती’ में 1920 और 2006 की दो लाइनें लिखी थीं. जब दोनों लाइनें आपस में मिल जाती हैं तो क्या होगा? जब कोई हमारी स्क्रिप्ट पढ़ता था तो कोई पैसे लगाने को तैयार नहीं होता था. एक महीने तक पैसे ही नहीं मिले. हम सबकुछ करने को तैयार थे.’
डायरेक्टर राकेश मेहरा ने फिल्म की स्टोरी लिखने में पूरे सात साल तक रिसर्च की थी. एआर रहमान ने इस फिल्म का म्यूजिक पूरे तीन साल में तैयार किया था. जब यह फिल्म रिलीज हुई तब सोहा अली खान की मां शर्मिला टैगोर सेंसर बोर्ड की अध्यक्ष थीं. ‘रंग दे बसंती’ फिल्म का बजट करीब 28 करोड़ रुपये रखा गया था. मूवी ने 97 करोड़ का वर्ल्डवाइड कलेक्शन किया था. यह एक हिट फिल्म साबित हुई थी. रंग दे बसंती फिल्म 2006 में बॉक्स ऑफिस पर पैसे कमाने के मामले में चौथे नंबर पर थी. पहले नंबर पर धूम 2 रही थी. फिल्म में दो कहानियां एकसाथ चलती हैं. एक तरफ कार गैराज में काम करने वाले 6 युवाओं की कहानी तो दूसरी ओर देश के क्रांतिकारियों की कहानी. फिल्म के क्लाइमैक्स ने आंखों में आंसू ला दिए थे. फिल्म में नजर आए आमिर खान, शरमन जोशी और आर. माधवन आगे चलकर 2009 में ‘3 इडियट्स’ में भी नजर आए थे. यह फिल्म भी ब्लॉकबस्टर रही थी.


