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Mohammed Rafi Kishore kumar Superhit Songs : बॉलीवुड फिल्मों में कव्वाली का अपना एक अलग ही मजा है. कव्वाली फिल्म की कहानी को आगे बढ़ाती है. दर्शकों के दिल-दिमाग पर तो असर करती है, उसके बोल झूमने को मजबूर कर देते हैं. 70-80 के दशक में फिल्मों में कव्वाली मूवी का अनिवार्य हिस्सा थीं. कई फिल्मों की पहचान इन्हीं कव्वाली से है. कई फिल्मों को हिट कराने में कव्वाली ने अहम रोल निभाया. हिंदी सिनेमा का एक साल ऐसा भी जब चार फिल्मों में चार कालजयी कव्वाली सुनाई दी थीं. इन कव्वालियों को किशोर कुमार-मोहम्मद रफी-मन्नाडे की आवाज में रिकॉर्ड किया गया था. दिलचस्प बात यह है कि चारों फिल्में हिट रहीं.

‘धुरंधर’ फिल्म की कव्वाली ‘ना तो कारवां की तलाश है, ना तो कारवां की तलाश है. ना तो हमसफ़र की तलाश है’ की पूरे देश में चर्चा हुई. यह कालजयी कव्वाली ‘बरसात की रात’ (1960) से ली गई थी. इस कव्वाली ने फिल्म की पृष्ठभूमि तैयार की. भारतीय सिनेमा के लिए 1973 का साल निर्णायक साबित हुआ. इसी साल महानायक अमिताभ बच्चन ‘जंजीर’ फिल्म से सुपर स्टार बने. 1973 में एक ही साल में चार ऐसी फिल्में रिलीज हुईं, जिनकी पहचान कव्वाली से है. चारों फिल्मों में कालजयी कव्वाली सुनने को मिलीं. ये कव्वालियां मोहम्मद रफी-मन्नाडे और किशोर कुमार की आवाज में थीं. ये फिल्में थीं : हंसते जख्म, अनोखी अदा, जंजीर और धर्म.

सबसे पहले बात करते हैं 20 अप्रैल 1973 को रिलीज हुई फिल्म ‘अनोखी अदा’ की जिसमें जीतेंद्र-रेखा-विनोद खन्ना लीड रोल में थे. कुंदन कुमार के निर्देशन में बनी इस फिल्म कहानी मुश्ताक जलीली ने लिखी थी. डायलॉग केके शुक्ला ने स्क्रीनप्ले रफी अजमेरी-विश्वनाथ पांडे ने लिखा था. लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने इस फिल्म में ऐसा म्यूजिक कंपोज किया, जिसका असर आज भी बरकरार है. किशोर दा ने इस फिल्म में एक कालजयी कव्वाली ‘हाल क्या है दिलों का ना पूछो सनम.’ गाई थी. इस कव्वालीपर पूरे उत्तर भारत लोकगायकों ने खूब गाने बना. इस कव्वाली को महफिल, गीत-संगीत की महफिल में आज भी गाया जाता है. गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी ने इस फेमस कव्वाली को लिखा था.

‘अनोखी अदा’ फिल्म में विनोद खन्ना विलेन के रोल थे. विनोद खन्ना ने अपने करियर की शुरुआत में निगेटिव रोल किए. यह इकलौती ऐसी फिल्म हैजिसमें जीतेंद्र हीरो हैं और विनोख खन्ना विलेन के किरदार में हैं. इस फिल्म के शूटिंग के दौरान जीतेंद्र ने रेखा को ‘टाइम पास’ बोला था. ‘टाइम पास’ शब्द सुनकर वो इतनी दुखी हुईं कि पूरे एक सप्ताह सेट पर नहीं आई थीं. फिल्म बॉक्स ऑफिस पर हिट साबित हुई थी.
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अगले ही माह मई 1973 में एक ऐसी फिल्म ‘जंजीर’ आई जिसने हिंदी सिनेमा को हमेशा हमेशा के लिए बदल दिया. इस फिल्म से ही अमिताभ बच्चन ‘एंग्री यंग मैन’ के रूप में उभरे. जंजीर फिल्म का डायरेक्शन प्रकाश मेहरा ने किया था. यह एक एक्शन क्राइम फिल्म थी जिसे सलीम-जावेद की जोड़ी ने लिखा था. फिल्म में अमिताभ बच्चन के अलावा, जया भादुड़ी, प्राण, अजित खान, ओम प्रकाश और बिंदु अहम भूमिकाओं में थे. म्यूजिक कल्याण जी-आनंद जी ने दिया था. फिल्म की सबसे पॉप्युलर कव्वाली ‘यारी है ईमान मेरा यार मेरी जिंदगी’ प्राण साहब पर फिल्माई गई थी. इस कालजयी कव्वाली को मन्नाडे ने गाया था. यह कव्वाली गीतकार गुलशन बावरा ने लिखी थी.

जंजीर फिल्म में पहली बार सलीम-जावेद और अमिताभ बच्चन की जोड़ी बनी. आगे चलकर इस तिकड़ी ने एक से बढ़कर एक फिल्में बनाई. ‘दीवार’ और ‘शोले’ जैसी फिल्में में यही तिकड़ी थी. इन फिल्मों ने अमिताभ बच्चन को सुपर स्टार के तौर पर इंडस्ट्री में स्थापित किया. प्रकाश मेहरा ने यह फिल्म पत्नी के गहने गिरवी रखकर बनाई थी. ‘जंजीर’ फिल्म की गिनती हिंदी सिनेमा की खास फिल्मों में होती है. फिल्म सुपरहिट साबित हुई थी.

1973 में एक और फिल्म ‘हंसते जख्म’ को इसकी कालजयी कव्वाली के लिए याद किया जाता है. मोहम्मद रफी ने यह कव्वाली गाई थी. कव्वाली के बोल थे : ये माना मेरी जान, मुहब्बत सजा है. फिल्म का म्यूजिक मदन मोहन ने कंपोज किया था. इस कव्वाली का क्रेज आज तक बरकरार है. आपने ‘हरे द्वारपालो कन्हैया से कह दो, मिलने सुदामा गरीब आ गया है’ भजन जरूर सुना होगा. यह भजन इसी कव्वाली की तर्ज पर बनाया गया है. ‘हंसते जख्म’ फिल्म में नवीन निश्चल, प्रिया राजवंश और बलराज साहनी लीड रोल में थे. फिल्म का डायरेक्शन-प्रोडक्शन बॉलीवुड सुपर स्टार देवानंद के बड़े भाई चेतन आनंद ने किया था.

‘हंसते जख्म’ गुलशन नंदा के एक उपन्यास पर बेस्ड थी. फिल्म का म्यूजिक बहुत कमाल का था. प्रोड्यूसर पहलाज निहलानी ने इस फिल्म का रीमेक ‘मिट्टी और सोना’ नाम से 1989 में बनाया गया. यह फिल्म भी हिट रही थी. पाकिस्तान में आरोसा नाम से 1993 में इस फिल्म को बनाया गया. नवीन निश्चल इस फिल्म से रातों रात स्टार बने लेकिन आगे चलकर गलत फिल्मों के चयन से उनका करियर डूब गया.

इस लिस्ट में आखिरी नाम ‘धर्मा’ फिल्म का है जो कि 30 नवंबर 1973 को रिलीज हुई थी. डायरेक्टर चांद के निर्देशन में बनी इस फिल्म में नवीन निश्चल, रेखा, प्राण लीड रोल में थे. बिंदु-अजीत और मदनपुरी भी अहम भूमिकाओं में थे. धर्मा एक मसाला फिल्म थी जिसमें मिलना-बिछुड़ना, धोखा-प्रेम-प्यार सब कुछ था. प्राण ने मेन विलेन के रोल में थे तो अजीत पुलिस अफसर बने थे. फिल्म का म्यूजिक सोनिक ओमी ने कंपोज किया था. सोनिक-ओमी का असल नम मनोहर लाल सोनिक और ओम प्रकाश सोनिक था जिन्होंने 1960-70 के दशक की हिंदी फिल्मों में म्यूजिक दिया. दोनों रिश्ते में चाचा-भतीजे थे. ‘धर्मा’ फिल्म की सफलता में सबसे बड़ा रोल मोहम्मद रफी-आशा भोसले की कव्वाली ‘राज की बात कह दूं तो’ का था. यह कालजयी कव्वाली प्राण-बिंदु पर फिल्माई गई थी.

‘धर्मा’ फिल्म के प्रोड्यूसर एसके कपूर थे. ‘राज की बात कह दूं तो’ कव्वाली को गीतकार वर्मा मलिक ने लिखा था. वही वर्मा मलिक जिन्होंने 70 के दशक में कई सुपरहिट गाने लिखे जिसमें ‘चलो रे डोली उठाओ कहार’ भी शामिल है. यह कव्वाली इतनी मशहूर हुई कि आज भी निजी जीवन में लोग अपने दिल के जज्बात को व्यक्त करने के लिए इसका सहारा लेते हैं. ‘धर्मा’ फिल्म 1973 की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मों की लिस्ट में छठवें नंबर पर थी. इस तरह से 1973 का कालजयी कव्वाली का साल कहा जा सकता है.


