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Bollywood cult superhit film : दर्शक हमेशा अच्छी फिल्में देखना चाहते हैं. उनमें स्टार भले ही बड़े ना हो, बस फिल्म की कहानी बहुत अच्छी हो. कहानी का प्रजेंटेशन अच्छा हो. गीत-संगीत अच्छा हो तो दर्शक अपने आप ही सिनेमाघरों में खिंचे चले आते हैं. राजश्री प्रोडक्शन ने ऐसा कारनामा कई बार दोहराया है. छोटे बजट की फिल्में बनाई और इन फिल्मों को दर्शकों ने खूब सराहा. ये फिल्में अपनी पटकथा-स्क्रीनप्ले के लिए याद की जाती हैं. कालजयी गीत-संगीत तो राजश्री प्रोडक्शन की पहचान ही रहे हैं. 48 साल पहले ऐसी ही एक फिल्म आई थी जिसका क्लाइमैक्स देखकर हर दर्शक थिएटर में रोया था. इसी फिल्म में पहली ‘डेट’ टर्म का इस्तेमाल किया गया था.
Ranjeeta Kaur and Sachin Pilgaonkar Movie : कर्णप्रिय गाने में एक सम्मोहन शक्ति होती है. उनके मनोहर दृश्य, उनकी गुणवत्ता की छाप कभी खत्म नहीं होती. ऐसे गाने सदियों तक जीवंत रहते हैं. राजश्री प्रोडक्शन के बैनर तले बनी 1978 की एक फिल्म में ऐसे ही कालजयी गाने सुनने को मिले थे. गाना 48 साल बाद भी उतना ही सुपरहिट है. इस गाने के शब्दों-संगीत से लेकर दृश्यों तक एक अद्भुत आकर्षण है. शायद ही ऐसा कोई शख्स होगा जो इस गाने से जुड़ाव महसूस न करता हो. ऐसा इसलिए है क्योंकि हम सभी किसी न किसी रूप में किसी न किसी से प्रेम करते हैं. यह गाना था : अंखियों के झरोखे से, मैंने देखा जो सांवरे. असल में यह गाना नहीं था, बल्कि एक अहसास था. इसे सुनते ही इंसान सारे गम भूल जाते हैं. हसीं पलों की यादों में खो जाने को मजबूर कर देता है. फिल्म का नाम भी ‘अंखियों के झरोखे से’ ही था.
‘अंखियों के झरोखों से’ 7 अप्रैल 1978 को रिलीज हुई थी. फिल्म एरिक सहगल के 1970 के नॉवेल ‘लव स्टोरी’ से इंस्पायर्ड थी. हिरेन नाग के निर्देशन में बनी इस फिल्म में सचिन पिलगांवकर, रंजीता कौर, मदन पुरी, इफ्तिखार, उर्मिला भट्ट और हरिंद्रनाथ चट्टोपाध्याय ने अपनी एक्टिंग का जलवा बिखेरा था. फिल्म की पटकथा-स्टोरी मधुसूदन कालेलकर ने लिखी थी. स्क्रीनप्ले हिरेन नाग, मधुसूदन कालेलकर और वृजेंद्र गौड़ ने मिलकर लिखा था. डायलॉग वृजेंद्र गौड़ ने लिखे थे. गीत-संगीत रविंद्र जैन का था. प्रोड्यूसर ताराचंद बड़जात्या थे. ताराचंद का बहुत बड़े डिस्ट्रीब्यूटर भी थे, इसलिए छोटे बजट की फिल्में बिना परेशानी के डिस्ट्रीब्यूट कर लेते थे. वह अपनी कहानियों को इतनी संजीदगी से चुनते थे कि दर्शक अपने आप ही उन फिल्मों को देखने के लिए चले जाते थे.
हिरेन नाग की ताराचंद बड़जात्या के साथ यह तीसरी फिल्म थी. इससे पहले उन्होंने ‘हनीमून’ (1973) और ‘गीत गाता चल’ (1975) का निर्देशन किया था. वैसे तो ‘गीत गाता चल’ फिल्म की पूरी टीम ने ‘अंखियों के झरोखों’ में काम किया था, सिर्फ सारिका को छोड़कर. पहले इस फिल्म में सारिका को काम करना था लेकिन फिर किसी बात को लेकर उनकी राजश्री प्रोडक्शन से अनबन हो गई थी. यह भी दिलचस्प संयोग है कि 1978 की ‘देवता’ फिल्म में सारिका का नाम लिली था. ‘अंखियों से झरोखो से’ में रंजीता कौर का नाम भी लिली ही था. मजेदार बात यह भी है कि दीप्ति नवल ने इस फिल्म के लिए स्क्रीन टेस्ट दिया था लेकिन वो फेल हो गई थी. जब रंजीत को फिल्म के लिए चुन लिया गया तो डायरेक्टर हिरेन नाग उनके साथ काम नहीं करनाचाहते थे. उन्होंने कहा कि वो रंजीता के साथ काम नहीं करेंगे लेकिन राजश्री प्रोडक्शन की ओर से कहा गया कि फिल्म तो रंजीता के साथ ही बनानी होगी.
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फिल्म तो बहुत अच्छी थी ही लेकिन इसके इसको कामयाब बनाने में गानों का बहुत बड़ा हाथ था. वैसे भी फिल्म का टाइटल ‘अंखियों के झरोखों से’ बाद में तय किया गया. पहले इस फिल्म का गाना रविंद्र जैन ने कंपोज कर लिया था. फिल्म का टाइटल ट्रैक अब तक के सबसे सुपरहिट गानों में से एक है. यह रविंद्र जैन के सर्वश्रेष्ठ गीतों में से एक है. फिल्म का टाइटल पूरी फिल्म में तीन बार सुनाई देता है. यह गाना कितना लोकप्रिय है, आप सब जानते हैं.
फिल्म में कुल 5 गाने थे. ये गाने थे : अंखियों के झरोंखे से (हेमलता), जाते हुए ये पल छिन (रविंद्र जैन), एक दिन तुम बहुत बड़े बनोगे (हेमलता-शैलेंद्र सिंह), कई दिन से मुझे (हेमलता-शैलेंद्र सिंह), दोहावली/बड़े बड़ाई ना करें (हेमलता-जसपाल सिंह). फिल्म का बैकग्राउंड बहुत अच्छा था. किरदारों की बातचीत-डायलॉग दिल छू लेने वाले थे. उर्मिला भट्ट का काम खूब सराहा गया. 26वें फिल्म फेयर अवॉर्ड में फिल्म को 5 नॉमिनेशन मिले थे. हेमलता को ‘अंखियों के झरोखे से’ के लिए नॉमिनेशन मिला था. रविंद्र जैन को बेस्ट म्यूजिक डायरेक्टर कैटेगरी में नॉमिनेशन मिला था. हालांकि फिल्म कोई फिल्मफेयर अवॉर्ड नहीं जीत पाई थी.
‘अंखियों के झरोखों से’ राजश्री प्रोडक्शन की अन्य फिल्मों की तरह सिंपल थी. कोई कॉमर्शियल ड्रामा नहीं था. फिल्म की कहानी बहुत सहज थी. अरुण (सचिन) बहुत रईस परिवार से है. हिंदू है और जबकि लिली (रंजीता) गरीब परिवार से है. क्रिश्चियन है. फिल्म फ्लैशबैक में चलती है. अरुण अमीर बाप का बेटा जरूर है लेकिन पढ़ाई में अव्वल है. बीए सेकंड ईयर के मिड टर्म एग्जाम में पहली बार जब वो सेकंड पोजिशन पर आता है तो परेशान हो जाता है. लिली फर्स्ट आ जाती है. दोहावली के बाद दोनों की मुलाकातें बढ़ती हैं. दोनों में प्यार हो जाता है. फिल्म में पहली बार ‘डेट’ टर्म यूज किया गया था. फिर लिली की तबीतयत खराब हो जाती है. उसे ब्लड कैंसर है.
लिली शादी कैसिंल कर देती है. अरुण जब अंतिम बार लिली से मिलने जाता है वो कहती है कि ‘एक बार तुमने मुझसे कुछ मांगा था और मैं चाहते हुए तुम्हारी वो इच्छा पूरी नहीं कर सकी थी लेकिन आज मैं प्यार का वही उपहार तुमसे मागूंगी तो तुम दोगे ना?’ दरअसल, वो किस की बात करती है. कैमरे में बिना दिखाए इस सीन को फिल्माया गया. इसी दौरान लिली की मौत हो जाती है. फिल्म यही खत्म हो जाती है. फिल्म का लास्ट सीन रुला देने वाला था. इस लास्ट सीन को देखकर हर दर्शक की आंखें नम हो जाती हैं.
1976 की लैला मजनू के बाद 1978 में रंजीता कौर की एक के बाद एक तीन सुपरहिट फिल्में आई. इनमें ‘पति-पत्नी और वो’, ‘दामाद’ और तीसरी ‘अंखियों के झरोखों से’. रंजीता कौर ने ‘अंखियों के झरोखों से’ जिस तरह की एक्टिंग की वह यादगार बन गई. इस फिल्म में उनका रोल भी बहुत ही अच्छा था. पूरे करियर में उन्हें ऐसा रोल नहीं मिला. फिल्म में जब उन्हें ब्लड कैंसर हो जाता है, उसके बाद उनके चेहरे का हाव-भाव, आंखों में सूजन, बुझा चेहरा देखकर दर्शकों स्तब्ध रह जाते हैं. रंजीता पूरी तरह से कैरेक्टर में नजर आती हैं.
फिल्म में दिखाया गया डीएन कॉलेज मुंबई का फेमस कॉले है जो कि मटुंगा में है. फिल्म का टाइटल सॉन्ग ठाणे के घोडबंदर रोड पर शूट हुआ था. यह उन चुनिंदा फिल्मों में से है जिसमें सचिन ने लीड हीरो का किरदार निभाया.
फिल्म का क्लाइमैक्स रुला देने वाला था. फिल्म बहुत कामयाब थी. फिल्म का बजट 48 लाख के करीब था और इस मूवी ने 1.5 करोड़ का कलेक्शन किया था. यह एक सुपरहिट फिल्म साबित हुई थी. फिल्म का सीक्वल 33 साल बाद 2011 में ‘जान-पहचान’ के नाम से आया था. यह फिल्म फ्लॉप रही थी. म्यूजिक रविंद्र जैन ने ही दिया था.


