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संगीत के इतिहास में वो मुकाम जहां एक ही बोल तीन बार, तीन अलग अंदाज में दिल को छू लेते हैं. जहां एक जादू दो अलग-अलग सुरों में पनपता है, कभी नर्म आवाज में बहता है तो कभी दर्द से कराहता है. एक रूहानी एहसास जो पल भर में गुलिस्तां बना देता है और एक आहट भर में ही वीराना भी. 2001 में एक ऐसा ही गाना आया. जो लोगों की जुबां पर ऐसा चढ़ा की आज भी उसकी खुमारी देखते बंधती है. 2001 में आई फिल्म ने एक गाना दिया जो तीन बार बजा, तीन बार गाया गया, लेकिन हर बार सुनने वाले के दिल के एक अलग तार को छेड़ा.
नई दिल्ली. कभी एक मां की टूटी हुई उम्मीद बनकर ये धुन आंखें नम कर देती है… कभी बेटे के बिछड़ने का दर्द बनकर दिल को चीर जाती है… और कभी पूरे परिवार को एक डोर में बांधकर रिश्तों की गर्माहट महसूस कराती है. साल 2001 में आई एक फिल्म का ये गाना सिर्फ म्यूजिक नहीं, बल्कि भावनाओं का ऐसा सफर बन गया था, जिसे हर पीढ़ी ने अपने-अपने तरीके से महसूस किया. खास बात ये रही कि एक ही गाने को तीन बार अलग-अलग एहसास के साथ फिल्म में पिरोया गया. दो बार दर्द भरे अंदाज में और एक बार पूरे शाही जश्न के साथ.
2001 का वो साल, जब सिनेमाघरों में एक परिवार की कहानी ने पूरे देश को अपनी गिरफ्त में ले लिया. पर्दे पर अमिताभ बच्चन की गरिमा, जया बच्चन की ममता, शाहरुख खान की जोशीली अदाकारी, काजोल की मासूमियत, ऋतिक रोशन की एनर्जी और करीना कपूर की चुलबुली मौजूदगी… बीच-बीच में एक संगीत ऐसा कि दिल के तार झंकृत हो जाएं. वो संगीत जो खुशी के पलों में आशीर्वाद बनकर बरसता है, तो कभी दर्द के समंदर में डूबकर आंसू पोंछता है. वो आवाजें जो पीढ़ियों को एक सूत्र में बांध देती हैं. एक तरफ स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर, दूसरी तरफ युवा स्वर का जादूगर सोनू निगम. ये फिल्म थी ‘कभी खुशी कभी गम’.
ये कहानी है फिल्म ‘कभी खुशी कभी गम’ के उस टाइटल ट्रैक की, जिसने रिलीज के 20 साल बाद भी लोगों के दिलों में अपनी जगह कायम रखी है. ये फिल्म सिर्फ अपनी स्टारकास्ट की वजह से नहीं, बल्कि अपने संगीत के कारण भी इतिहास बन गई थी. शाहरुख खान, काजोल, अमिताभ बच्चन, जया बच्चन, ऋतिक रोशन और करीना कपूर खान जैसे सितारों से सजी इस फिल्म का टाइटल ट्रैक अपने आप में एक भावनात्मक अनुभव था.
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संगीतकार जतिन-ललित की धुन, समीर के बोल और लता दीदी व सोनू निगम की आवाज ने इसे कालजयी बना दिया. फिल्म का पहला भव्य टाइटल ट्रैक 7 मिनट 55 सेकंड का
है. फिल्म की शुरुआत में लता मंगेशकर की आवाज में यह गाना सुनाई देता है. नंदिनी रायचंद यानी जया बच्चन की आवाज बनकर यह प्रार्थना-सा गूंजता है. ‘कभी खुशी कभी गम… ना जुदा होंगे हम…’ यह संस्कारों, परिवार की एकता और ईश्वर में विश्वास का गान है. लता दी की मधुर, गहरी और भावपूर्ण आवाज इसे भजन की महिमा देती है. शाहरुख खान यानी राहुल के एंट्री सीन के साथ यह गाना फिल्म की नींव रखता है. यह संस्कृति, ममता और घरेलू मूल्यों का प्रतीक बन जाता है.
इसी गाने को फिर एक बार सुना गया. लेकिन इस बार सैड वर्जन का पहला पार्ट था. जिसको सोनू निगम ने गाकर अमर किया. फिल्म में ये गाना तब आता है, जब राहुल घर छोड़कर अनजान राह पर निकल जाता है. लगभग 1:53 मिनट का यह छोटा सा टुकड़ा दिल को चीर देता है. सोनू की कोमल लेकिन दर्द भरी आवाज रोहन यानी ऋतिक रोशन के मनोभाव को बयां करती है. भाई के बिना अधूरापन, परिवार के टूटने का गम. यह वर्जन युवा पीढ़ी की पीड़ा, अलगाव और खामोश दर्द को छूता है.
फिल्म के क्लाइमैक्स के पास, जब 10 साल बाद राहुल वापस लौटता है, तब लता मंगेशकर फिर से अपनी जादुई आवाज में सैड वर्जन पार्ट-2 गाती हैं. यह मां की छाती का दर्द, बेटे को गले लगाने की बेकरारी और सालों के इंतजार को शब्द देता है. लता जी की आवाज यहां आंसुओं का सैलाब ला देती है. ‘कभी खुशी कभी गम’ का यही रूप दर्शकों को सबसे ज्यादा रुलाता है.
करण जौहर द्वारा निर्देशित यह फिल्म रायचंद परिवार की कहानी है. इस गाने ने फिल्म को भावनात्मक गहराई दी. पहला वर्जन परिवार की खुशियों का गान है, जबकि दोनों सैड वर्जन अलगाव और मिलन के दर्द-मधुर सफर को दर्शाते हैं. लता मंगेशकर और सोनू निगम की जोड़ी ने इसे पीढ़ियों का गाना बना दिया. मां-दादी-नानी इसे सुनकर रोती हैं, तो बच्चे भी इसके सुर में झूमते हैं.
14 दिसंबर 2001 को रिलीज हुई यह फिल्म उस समय की सबसे महंगी भारतीय फिल्मों में शामिल थी. इसका बजट लगभग 30-40 करोड़ था. भारत में नेट कलेक्शन 55 करोड़ रुपये से ज्यादा, वर्ल्डवाइड कुल ग्रॉस 119-135 करोड़ रुपये के आसपास रहा. ये 2001 की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर फिल्म बनी. विदेशी बाजारों में भी फिल्म रिकॉर्ड तोड़े. फिल्म ने 5 फिल्मफेयर अवॉर्ड्स जीते. संगीत एल्बम भी सुपरहिट रहा. ‘कभी खुशी कभी गम’ के अलावा ‘बोले चूड़ियां’, सूरज हुआ मद्धम’, ‘ये लड़का है अल्लाह’ जैसे गाने भी यादगार बने, लेकिन टाइटल ट्रैक ने फिल्म को अमर बना दिया.
21वीं सदी में भी जब परिवार टूटने लगते हैं, रिश्ते बिखरने लगते हैं, तब यह गाना याद आता है. लता दीदी की आवाज मां की ममता है, सोनू की आवाज बेटे का दर्द. यह गाना सिर्फ संगीत नहीं, बल्कि भारतीय परिवार व्यवस्था का दर्शन है. जहां कभी खुशी, कभी गम है लेकिन साथ कभी नहीं छूटना. इस गाने की सबसे बड़ी खासियत यही रही कि इसे सिर्फ सुना नहीं गया, बल्कि महसूस किया गया. एक ही धुन को तीन अलग-अलग भावनाओं में ढालना आसान नहीं होता, लेकिन लता मंगेशकर और सोनू निगम की आवाज ने इसे अमर बना दिया. यही कारण है कि दो दशक बाद भी यह गाना हर उम्र के लोगों को अपने परिवार, रिश्तों और अपनों की याद दिला देता है.


