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एस. डी. बर्मन रिकॉर्डिंग सुनकर खुश हो चुके थे. उन्हें लगा कि गाना पूरी तरह तैयार है लेकिन मोहम्मद रफी मानने को तैयार नहीं थे. रफी साहब का कहना था कि आवाज में अभी वो टूटन और दर्द नहीं आया, जो दिल तक पहुंचे. फिर शुरू हुआ री-टेक का लंबा सिलसिला. करीब 47 बार रिकॉर्डिंग हुई. स्टूडियो में मौजूद लोग हैरान थे, लेकिन जब फाइनल टेक सामने आया तो सब खामोश रह गए.वही गाना बाद में हिंदी सिनेमा के सबसे दर्दभरे और अमर गीतों में शामिल हो गया. जानते हैं वो गीत कौन सा है?

नई दिल्ली. भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ गाने ऐसे हैं, जो सिर्फ सुने नहीं जाते बल्कि महसूस किए जाते हैं.’दिन ढल जाए’ उन्हीं अमर गीतों में शामिल है. 1965 में आई फिल्म ‘गाइड’ का यह दर्दभरा गाना आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों में बसता है. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस गाने को रिकॉर्ड करते वक्त ऐसा किस्सा हुआ था, जिसने इसे हमेशा के लिए यादगार बना दिया.

महान संगीतकार एसडी बर्मन अपनी कुर्सी पर झूम रहे थे. उन्होंने अभी-अभी ‘दिन ढल जाए, हाय रात न जाए’ गाने का पहला टेक सुना था. रिकॉर्डिंग खत्म होते ही बर्मन दा ने कहा, ‘तुमने तो मानो परफेक्ट गा दिया, ओके है!’ लेकिन, मोहम्मद रफी साहब के चेहरे पर वह संतोष नहीं था. उन्होंने अपना हेडफोन उतारा, थोड़ा रुके और फिर साफ लहजे में कहा- ‘बर्मन दा, ये गाना दिल से नहीं उतरा, दर्द अभी बाकी है दादा…’ मुझे दोबारा मौका दीजिए.’

फिर शुरू हुई मेहनत. देव आनंद और पूरी टीम ने 47 री-टेक दिए. नतीजा? एक ऐसा गाना जो आज भी दर्द की गहराई बयां करता है. इस घटना को गए 61 साल हो गए हैं, लेकिन यह किस्सा आज भी हर संगीत प्रेमी के रोंगटे खड़े कर देता है. ‘दिन ढल जाए’ फिल्म ‘गाइड’ का अमर गीत है.
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फिल्म ने 1965 में रिलीज होकर इतिहास रच दिया. इस गाने में कथित तौर पर मोहम्मद रफी ने 47 रीटेक लिए थे. रफी साहब को लगा कि उस गाने में ‘तड़प’ और ‘उदासी’ अभी भी परफेक्ट नहीं है. हर टेक के बाद वह खुद को सुनते, सिर हिलाते, और फिर से स्टूडियो में घुस जाते. आखिर में जब 47वीं टेक के बाद रफी साहब के चेहरे पर संतोष आया, तब बर्मन दा ने उन्हें गले लगा लिया और कहा- ‘तुमने तो हिंदी सिनेमा को अमर गीत दे दिया है.’

जब गाना फाइनल हुआ तो स्टूडियो में मौजूद लोग कुछ पल के लिए शांत हो गए. रफी साहब की आवाज में दर्द ऐसा था कि सुनने वालों की आंखें नम हो गईं. यही वजह है कि ‘दिन ढल जाए, हाय रात ना जाए’ सिर्फ एक गाना नहीं बल्कि टूटे दिल की आवाज बन गया.

गाइड का संगीत एस.डी. बर्मन की बेहतरीन रचनाओं में शुमार है. शैलेन्द्र के गीत और लता मंगेशकर, रफी, किशोर कुमार, मन्ना डे की आवाजों ने इसे अमर बना दिया. फिल्म में ‘दिन ढल जाए, हाय रात ना जाए’ के अलावा ‘आज फिर जीने की तमन्ना है’, ‘गाता रहे मेरा दिल’, ‘पिया तोसे नैना लागे रे’, ‘तेरे मेरे सपने’, ‘वहां कौन है तेरा’, ‘मोसे छल किये जाए’, ‘क्या से क्या हो गया’ जैसे गाने थे. फिल्म का पूरा एल्बम आज भी टॉप क्लासिक एल्बम्स में गिना जाता है. फिल्म के गीतकार शैलेंद्र थे, जिन्होंने हर गाने में गहरी भावनाएं पिरो दीं.

फिल्म के रिलीज होने से पहले किसी फाइनेंसर को इस पर भरोसा नहीं था. लेकिन जब ‘गाइड’ सिनेमाघरों में उतरी, तो उसने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए. फिल्म का बजट लगभग 54 लाख रुपये था. फिल्म ने भारत में नेट कलेक्शन 1.75 करोड़ रुपये और वर्ल्डवाइड 3.5 करोड़ के आसपास रहा. फिल्म सुपरहिट रही और ये देव आनंद की करियर की टर्निंग प्वाइंट साबित हुई.

14वें फिल्मफेयर अवॉर्ड्स में फिल्म ने रिकॉर्ड बनाया. गाइड को 9 नामांकन मिले थे, जिसमें से 7 अवॉर्ड जीते. बेस्ट फिल्म, बेस्ट डायरेक्टर (विजय आनंद), बेस्ट एक्टर (देव आनंद), बेस्ट एक्ट्रेस (वहीदा रहमान), बेस्ट डायलॉग, बेस्ट स्टोरी (आर.के. नारायण) और बेस्ट सिनेमेटोग्राफी. यह फिल्मफेयर के इतिहास में पहली फिल्म थी, जिसने चार बड़े अवॉर्ड (फिल्म, डायरेक्टर, एक्टर, एक्ट्रेस) अपने नाम किए. फिल्म को नेशनल अवॉर्ड भी मिला.

‘गाइड’ एकमात्र ऐसी फिल्म है, जिसे भारत की तरफ से ऑस्कर में भेजा गया था. इतना ही नहीं, 2008 में यह कान्स फिल्म फेस्टिवल के ‘कान्स क्लासिक्स’ सेक्शन में प्रदर्शित होने वाली पहली भारतीय फिल्म भी बनी और देव आनंद ने रेड कार्पेट पर कदम रखा था.

आर.के. नारायण के उपन्यास ‘द गाइड’ पर आधारित यह फिल्म राजू (देव आनंद) और रोजी (वहीदा रहमान) की जिंदगी, प्यार, धोखे और आध्यात्मिक यात्रा की कहानी है. विजय आनंद का डायरेक्शन, फाली मिस्त्री का सिनेमेटोग्राफी और दादा बर्मन का संगीत आज भी बेजोड़ हैं. गाइड सिर्फ फिल्म नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा का एक मील का पत्थर है.


