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Sad Ending Bollywood movies : हैप्पी एंडिंग हर फिल्म की आत्मा है. हर दुख का अंत होता है. रील से लेकर रियल लाइफ में यही कहानी देखने को मिलती है. बॉलीवुड फिल्मों में हैप्पी एंडिंग अनिवार्य हिस्सा है. ‘अंत भला तो सब भला’ आम बोलचाल में भी खूब इस्तेमाल होता है मगर कुछ फिल्मकारों ने इस परंपरा को तोड़ा. उन्होंने अपनी फिल्मों की एंडिंग ऐसी रखी कि दर्शकों की आंखें नम हो गईं. 35 साल के अंतराल में चार ऐसी फिल्में आईं जिनममें डायरेक्टर-प्रोड्यूसर ने अपनी जिद पर सैड एंडिंग रखी. चारों ही फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर तहलका मचा दिया. सभी फिल्मों के गाने आज भी सुपरहिट हैं.
एक फिल्म में कई तरह के इमोशंस-सीन देखने को मिलते हैं. सुख-दुख, प्यार-लगाव और जुदाई इन सभी एलिमेंट को मिलाकर एक फिल्म बनती है. बॉलीवुड हो या हॉलीवुड ज्यादातार फिल्मों में यही सब एलिमेंट होते हैं. यहां तक कि साइंस फिक्शन फिल्मों में इमोशंस डाले जाते हैं. इन सबके चलते दर्शक बहुत जल्दी फिल्म की कहानी से जुड़ जाते हैं. बॉलीवुड की ज्यादातर फिल्मों में लास्ट में हैप्पी एंडिंग दिखाई जाती है. फिल्में समाज का आईना होती है और जीवन की सच्चाई को दिखाती हैं. सच यह भी है कि सच्चा प्यार अधूरा रह जाता है. इसी सच्चाई को जब फिल्मों में दिखाया गया तो दर्शक हैरान रह गए. एंडिंग देखकर दर्शक मायूस हुए. हालांकि इन फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर कमाल का प्रदर्शन किया. 35 साल के अंतराल में ऐसी ही चार फिल्में बनीं. ये फिल्में हैं : अंखियों के झरोखों से, एक दूजे के लिए, कयामत से कयामत तक और आशिकी 2.
सबसे पहले बात करते हैं 7 अप्रैल 1978 को रिलीज हुई ‘अंखियों के झरोखों से’ फिल्म की जो एरिक सहगल के 1970 के नॉवेल ‘लव स्टोरी’ से इंस्पायर्ड थी. हिरेन नाग के निर्देशन में बनी इस फिल्म में सचिन पिलगांवकर और रंजीता कौर लीड रोल में थे. पटकथा-स्टोरी मधुसूदन कालेलकर ने लिखी थी. स्क्रीनप्ले हिरेन नाग, मधुसूदन कालेलकर और वृजेंद्र गौड़ ने मिलकर लिखा था. डायलॉग वृजेंद्र गौड़ ने लिखे थे. गीत-संगीत रविंद्र जैन का था. प्रोड्यूसर ताराचंद बड़जात्या थे. फिल्म को कामयाब बनाने में गानों का बहुत बड़ा हाथ था. फिल्म का टाइटल ट्रैक ‘अंखियों के झरोखों से’ पूरी फिल्म में तीन बार सुनाई देता है. अब तक के सबसे सुपरहिट गानों में से एक है. गाना हेमलता ने गाया था.
फिल्म 5 गाने थे. राजश्री प्रोडक्शन के बैनर तले बनी इस फिल्म की एंडिंग देखकर सिनेमाघरों में दर्शक खूब रोए थे. फिल्म की एंडिंग रुला देने वाली है. हीरो-हीरोइन का मिलन फिल्म में नहीं हो पाता है. अरुण जब अंतिम बार लिली से मिलने जाता है तो वो कहती है वो किस की बात करती है. कैमरे में बिना दिखाए इस सीन को फिल्माया गया. इसी दौरान लिली की मौत हो जाती है. फिल्म यही खत्म हो जाती है. फिल्म का लास्ट सीन रुला देने वाला था. इस लास्ट सीन को देखकर हर दर्शक की आंखें नम हो जाती हैं. फिल्म बहुत कामयाब थी. फिल्म का बजट 48 लाख के करीब था और इस मूवी ने 1.5 करोड़ का कलेक्शन किया था. यह एक सुपरहिट फिल्म साबित हुई थी.
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‘सोलह बरस की बाली उमर को सलाम’ ‘हम बने तुम बने एक दूजे के लिए’ गाने आपने भी जरूर सुने होंगे. इन गानों को सुनते ही पहले प्यार की यादें दिल-दिमाग में उभरने लगती हैं. जीवन का एक कड़वा सच यही है कि पहला प्यार अधूरा रह जाता है. कुछ इसी तरह के जज्बातों 5 जून 1981 को रिलीज ‘एक दूजे के लिए’ में देखने को मिले थे. फिल्म में सपना-वासु की लव स्टोरी थी. ‘एक दूजे के लिए’ फिल्म तेलुगु मूवी ‘मारो चरित्र’ का रीमेक थी. पहले इस फिल्म का टाइटल ‘एक और इतिहास’ रखा जाना था लेकिन बाद में इसे बदल दिया गया. फिल्म के डायरेक्टर के. बालचंदर थे. म्यूजिक लक्ष्मीकांत प्यारे लाल का था. प्रोड्यूसर एलवी प्रसाद थे.
‘एक दूजे के लिए’ फिल्म में भी हीरो-हीरोइन लास्ट में नहीं मिल पाते हैं. सही मायने में रोमांटिक बॉलीवुड फिल्मों में सैड एंडिंग का ट्रेंड भी इसी फिल्म से शुरू हुआ. यह फिल्म इस लिहाज से मील का पत्थर साबित हुई. राज कपूर ने भी फिल्म की एंडिंग बदलने की सलाह डायरेक्टर को दी थी, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया था. 70 लाख रुपये के बज में बनी फिल्म ने वर्ल्डवाइड 10 करोड़ का कलेक्शन किया था. यह एक ब्लॉकबस्टर फिल्म साबित हुई थी. 1981 में बॉक्स ऑफिस पर कमाई के मामले में यह मूवी 6वें नंबर पर रही थी.
‘एक दूजे के बाद’ तो इस ट्रेंड ने और जोर पकड़ा. 1989 में सॉफ्ट रोमांटिक मेलोडियस ड्रामा फिल्म ‘कयामत से कयामत तक’ आई थी. आमिर खान और जूही चावला की यह डेब्यू फिल्म थी. फिल्म की कहानी यंग जनरेशन को ध्यान में रखकर लिखी गई थी. स्क्रिप्ट आमिर खान के चाचा नासिर हुसैन ने लिखी थी. डायरेक्शन आमिर खान के कजिन मंसूर खान ने किया था. धड़कनों में समा जाने वाला आनंद-मिलिंद का बेमिसाल म्यूजिक था. गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी थे. फिल्म के ब्लॉकबस्टर गाने ‘पापा कहते हैं, ऐ मेरे हमसफर, एक जरा इंतजार’, ‘अकेले हैं तो क्या गम है’ और ‘गजब का है दिन’ ने धूम मचा दी थी. आज भी यह गाने उतने ही पॉप्युलर हैं.
इस फिल्म की एंडिंग देख दर्शक मायूस हो गए थे. दरअसल फिल्म के अंत में जूही चावला की मौत हो जाती है. हीरो-हीरोइन
हमेशा के लिए बिछड़ जाते हैं. करीब 3 करोड़ रुपये के बजट में बनी ‘कयामत से कयामत’ ने वर्ल्ड वाइड 6.5 करोड़ रुपये का कलेक्शन किया था. यह एक ब्लॉकबस्टर फिल्म साबित हुई थी. 1988 में सबसे ज्यादा पैसा कमाने के मामले में ‘कयामत से कयामत तक’ तीसरे नंबर पर रही थी. इस फिल्म को दो नेशनल अवॉर्ड और 8 फिल्मफेयर अवॉर्ड मिले थे.
2003 में सलमान खान-भूमिका चावला की फिल्म ‘तेरे नाम’ फिल्म की गिनती आज कल्ट मूवी में होती है. फिल्म की एंडिंग बहुत ही उदास करने वाली थी. फिर पूरे 10 साल बाद 26 अप्रैल 2013 को ‘आशिकी 2’ रिलीज हुई जिसमें श्रद्धा कपूर और आदित्य रॉय कपूर लीड रोल में थे. दोनों की यह डेब्यू फिल्म थी. यह म्यूजिकल रोमांटिक फिल्म थी. डायरेक्शन महेश भट्ट के भांजे मोहित सूरी ने किया था. प्रोड्यूसर महेश भट्ट, मुकेश भट्ट और भूषण कुमार थे. कहानी शगुफ्ता रफीक ने लिखी थी. शगुफ्ता रफीक ने अपनी जिंदगी को पर्दे पर उतारा था. म्यूजिक जीत गांगुली, मिथुन और अंकित तिवारी ने मिलकर कंपोज किया था. म्यूजिक एल्बम सुपरहिट रहा था.
आशिकी 2 की एंडिंग भी रुला देने वाली थी. हीरो की मौत हो जाती है. आशिकी 2 की एंडिंग देखकर प्रेमी दिल मायूस हो गए थे. आशिकी 2 में आदित्य रॉय कपूर कैरेक्टर के हिसाब से नशे में रहते थे ताकि किरदार के साथ न्याय कर सकें. फिल्म का बजट करीब 15 करोड़ रुपये का था. इंडिया में इस फिल्म ने करीब 78 करोड़ कमाए थे. वर्ल्ड वाइड 109 करोड़ का कलेक्शन किया था. यह एक ब्लॉकबस्टर फिल्म साबित हुई थी.


