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Dharmendra Timeless Action Film : साल था 1975. अगस्त का महीना था. धर्मेंद्र-हेमा मालिनी की एक फिल्म रिलीज हुई. फिल्म को कोई रिस्पांस नहीं मिला. डायरेक्टर-प्रोड्यूसर ने बहुत लगन से फिल्म बनाई थी. फिल्म को फ्लॉप होता देख डायरेक्टर घबरा गए. वो जल्दी से अमिताभ बच्चन के घर पहुंचे. गहन मंत्रणा हुई. फिर तय हुआ कि फिल्म का क्लाइमैक्स बदला जाए. फिल्म का कुछ हिस्सा फिर से शूट किया जाए. बाद में तय हुआ कि वीकेंड का इंतजार किया जाए. चार दिन बाद चमत्कार हुआ. जिस फिल्म को पूरी यूनिट फ्लॉप समझ रही थी, वही मूवी हिंदी सिनेमा की कालजयी मूवी साबित हुई. कमाई के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए. मूवी ने वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया.
हिंदी सिनेमा के इतिहास का सबसे यादगार साल 1975 को माना जाता है. इस साल ऐसी फिल्में आईं जिनकी चर्चा 50 साल भी होती है. इसी साल धर्मेंद्र-हेमा मालिनी, अमिताभ बच्चन-जया भादुड़ी और अमजद खान स्टारर एक ऐसी कालजयी फिल्म आई जिसे डायरेक्टर और राइटर ने फ्लॉप मान लिया था. फिर से फिल्म के कुछ हिस्से को शूट करने की रणनीति पर भी चर्चा की थी. फिर चमत्कार हुआ. फिल्म पूरे 52 हफ्ते तक चलती रही. हम 15 अगस्त 1975 को रिलीज हुई ‘शोले’ फिल्म की बात कर रहे हैं जिसका नाम जुबान पर आते ही इसके डायलॉग, एक-एक सीन और किरदार दिल-दिमाग के सामने आ जाते हैं. इस फिल्म की चर्चा किए बिना हिंदी सिनेमा अधूरा है.
‘कितने आदमी थे’, ‘बहुत याराना लगता है’, ‘इतना सन्नाटा क्यों है भाई’ और ना जाने कितने कालजयी डायलॉग ‘शोले’ फिल्म के सिनेप्रेमियों की जुबान पर रटे हुए हैं. ‘शोले’ फिल्म को रिलीज हुए 50 साल हो चुके हैं लेकिन इस टाइमलेस मूवी की यादें, इसके सीन हिंदुस्तान के हर सिने प्रेमी के दिल-दिमाग और जेहन में बसे हुए हैं.
रमेश सिप्पी के डायरेक्शन में बनी इस फिल्म की कहानी 70-80 के दशक की चर्चित राइटर जोड़ी सलीम-जावेद ने लिखी थी . फिल्म में धर्मेंद्र-अमिताभ बच्चन, हेमा मालिनी, संजीव कुमार, अमजद खान और जया बच्चन जैसे सितारे लीड रोल में थे. सबसे दिलचस्प बात यह है कि जब फिल्म रिलीज हुई तब इसे रिस्पांस नहीं मिला था.
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अमिताभ बच्चन ने केबीसी के सेट पर पूरा किस्सा सुनाया था. उन्होंने बताया था, ‘फिल्म को रिस्पांस नहीं मिला तो सलीम-जावेद और रमेश सिप्पी मेरे घर आए. बोले कि गड़बड़ हो गई. पिक्चर चली नहीं है, फ्लॉप हो गई है. बैठे रहे, बात करते रहे. वजह क्या हो सकती है? बहुत सारी वजहें ढूंढी, फिर एक निर्णय निकला कि विधवा विवाह की बात बहुत ही इमोशनल है, उसका जीवन फिर से संवर जाए, यह हमारे समाज में चलन बढ़ रहा है. फिल्म में यह था कि मेरी मृत्यु हो जाती है और जया विधवा हो जाती हैं, उनका जीवन फिर से खराब हो जाता है, पहले भी गब्बर ने खून-खराबा करके उन्हें विधवा कर दिया था. इसको ठीक करना चाहिए. ये तय हुआ कि हम जय को फिर से जीवित कर देंगे. हमको जया के साथ मिलवा देंगे ताकि जनता इसे अच्छी तरह से समझ जाएगी. हमने पूछा कि कैसे होगा ये सब? तय हुआ कि फिर से शूटिंग की जाएगी. फ्राइडे को यह सब बातें हो रही थीं. तय हुआ कि शूटिंग शनिवार रात को होगी. रविवार को नया प्रिंट रिलीज कर दिया जाएगा और मंडे तक देखेंगे कि क्या रिजल्ट आता है. हम निराश हो गए. फिर रमेश सिप्पी बोले कि सोमवार तक इंतजार कर लेते हैं. मंडे के बाद इतिहास रच गया.’
सबसे दिलचस्प बात यह है कि रमेश सिप्पी ने अमजद खान को गब्बर सिंह का रोल दिए अपनी बहन के एक सुझाव पर दिया था. अमजद खान ने अपने एक इंटरव्यू में गब्बर सिंह के किरदार ने बारे में बताया था, ‘मेरा जातीय नजरिया ये है कि गब्बर के किरदार को और संवारने वाला, ना सिर्फ डायरेक्टर रमेश सिप्पी थे, और राइटर्स थे, बल्कि बैकग्राउंड म्यूजिक भी कमाल का था. ना सिर्फ वो ‘महबूबा ओ महबूबा’ गाना बल्कि गब्बर की एंट्री पर बैकग्राउंड में हर वक्त एक अजीब सी धुन फिजा में तैर जाती थी. उसने जो इंपैक्ट क्रिएट किया, जो तहलका मचाया, वो कमाल का था. इसमें बहुत बड़ा योगदान आरडी बर्मन यानी पंचम दा का था. मेरी नजर में उस फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक बहुत बड़ा प्लस प्वॉइंट था.’
धर्मेंद्र-हेमा मालिनी ने ‘शोले’ से पहले रमेश सिप्पी के साथ ‘सीता और गीता’ फिल्म में काम किया था. हेमा मालिनी को शुरुआत में बसंती का रोल पसंद नहीं आया था. उन्होंने अपने एक पुराने इंटरव्यू में बताया था, ‘मैंने रमेश सिप्पी से कहा कि सीता और गीता में लीड रोल देने के बाद आप मुझे छोटा सा रोल दे रहे हैं, मुझे अच्छा नहीं लग रहा. वो बोले कि आप यह रोल कर लें वर्ना पछताना पड़ेगा. बाद में यही रोल मेरी पहचान बन गया.’ हेमा मालिनी ने अमजद खान को सबसे खूंखार विलेन करार दिया था. उन्होंने बताया था, ‘जब तक है जां, जाने जहां, मैं नाचूंगी’ गाना के दौरान जब अमजद खान के हाथ से निकलकर भागने का प्रयास करती हूं. वो सीन के हिसाब पकड़ लेते हैं. उन्होंने मेरा हाथ ऐसा पकड़ा कि उतना हिस्सा नीला पड़ गया. उन्होंने माफी मांगी और बर्फ लेकर आए.’
यह भी दिलचस्प फैक्ट है कि ‘शोले’ फिल्म की कहानी धर्मेंद्र-आशा पारेख और विनोद खन्ना की 1971 की मूवी ‘मेरा गांव मेरा देश’ से लगभग मिलती-जुलती है. उस फिल्म में विलेन का रोल करने वाले विनोद खन्ना के कैरेक्टर का नाम झब्बर सिंह था. शोले फिल्म के विलेन का नाम गब्बर सिंह था. दोनों फिल्मों की कहानी ठाकुओं पर बेस्ड थी.
शोले फिल्म की स्टोरी शुरुआत में मनमोहन देसाई के पास गई थी. उन्होंने स्टोरी को देखकर कहा था कि यह मेरे टाइप की फिल्म नहीं है. मुझसे यह फिल्म नहीं बनेगी. फिर सलीम-जावेद ने स्टोरी प्रकाश मेहरा को सुनाई. शुरुआत में जय-वीरु आर्मी अफसर थे. फिर सलीम-जावेद सिर्फ चार लाइन का आइडिया लेकर रमेश सिप्पी से मिले. फिल्म का बजट एक करोड़ बढ़कर 3 करोड़ हो गया था.
रमेश सिप्पी ने अपने एक पुराने एक इंटरव्यू में बताया था कि सिर्फ 4 लाइन के आइडिया को डेवलप करके शोले फिल्म बनाई गई. वो उन दिनो ‘मजबूर’ फिल्म बना रहे थे. रमेश सिप्पी के पिता जीपी सिप्पी जाने-माने प्रोड्यूसर थे. पिता के कहने पर उन्होंने ‘मजबूर’ फिल्म छोड़ दी थी जबकि उसकी स्क्रिप्ट तैयार थी और शोले पर काम शुरू किया. रमेश सिप्पी ने फिल्म में अमिताभ बच्चन को जय वाला रोल सलीम-जावेद के कहने पर दिया था. पूरे एक हफ्ते तक फिल्म को दर्शक नहीं मिले. फिर फिल्म ने इतिहास रच दिया. हिंदी सिनेमा के इतिहास में सबसे ज्यादा टिकट इस फिल्म के बिकने का वर्ल्ड रिकॉर्ड भी शोले के नाम है. शोले ने उस समय 50 करोड़ का कलेक्शन किया था.


