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1977 का साल हिंदी सिनेमा के लिए किसी ‘रंगीन मुकाबले’ से कम नहीं था, जहां हर हफ्ते बॉक्स ऑफिस पर कोई न कोई बड़ी फिल्म दर्शकों को अपनी ओर खींच रही थी. यह वह दौर था जब एक तरफ रोमांस और पारिवारिक भावनाओं वाली कहानियां थिएटरों में गूंज रही थीं तो दूसरी तरफ एक्शन, कॉमेडी और मसाला एंटरटेनमेंट ने भी दर्शकों को पूरी तरह बांध रखा था. इसी साल ‘हम किसी से कम नहीं’, ‘धरम वीर’, ‘चाचा भतीजा’, ‘परवरिश’ और ‘अपनापन’ जैसी फिल्मों ने सिनेमाघरों में जबरदस्त भीड़ जुटाई और स्टार पावर का जलवा दिखाया. लेकिन इसी चमक-दमक और हिट फिल्मों की भीड़ के बीच एक अलग तरह की सिनेमाई सोच भी जन्म ले रही थी. जहां कहानियां सिर्फ घटनाओं तक सीमित नहीं थीं, बल्कि उन्हें भावनाओं, कल्पना और बड़े पैमाने के मनोरंजन में ढाला जा रहा था. यही वह माहौल था जिसमें कुछ फिल्मों ने न सिर्फ टिकट खिड़की पर कमाल किया, बल्कि आने वाले दशकों के लिए ‘मसाला सिनेमा’ की परिभाषा ही बदल दी.
नई दिल्ली. साल 1977 का वह दौर भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक बेहद हलचल भरा साल था. बॉक्स ऑफिस पर एक तरफ जहां राज कपूर के बैनर तले बनी ‘धरम वीर’ की तलवारें खनक रही थीं, वहीं दूसरी तरफ राजेश खन्ना की ‘छैला बाबू’ और विनोद खन्ना की ‘खून पसीना’ थिएटर्स में दर्शकों की भारी भीड़ जुटा रही थीं. इसी साल पर्दे पर ‘परवरिश’ और ‘हम किसी से कम नहीं’ जैसी संगीतमय फिल्मों ने भी कामयाबी का एक नया दौर शुरू किया था. लेकिन इसी चमक-धमक और कड़े कॉम्पिटिशन के बीच, पर्दे के पीछे एक ऐसी फिल्म की स्क्रिप्ट तैयार हो रही थी, जो आगे चलकर कमाई के सारे रिकॉर्ड तोड़ देने वाली थी.
इस महा-ब्लॉकबस्टर की शुरुआत किसी बड़े लेखक के आलीशान केबिन में नहीं, बल्कि मुंबई की एक ढलती शाम को अखबार की एक दर्दनाक सुर्खी से हुई थी. एक मजबूर, बदहाल बाप ने अपने ही तीन मासूम बच्चों को एक पार्क में लावारिस छोड़ दिया था. अखबार की यह हकीकत रूह कंपा देने वाली थी. लेकिन जब इस खबर पर बॉलीवुड के एक जीनियस फिल्ममेकर की नजर पड़ी, तो उन्होंने इस दर्दनाक दास्तान को अपने खास जादुई मसाले के साथ पूरी तरह से घुमा दिया. उन्होंने एक ऐसा ताना-बाना बुना जिसने मजहब की दीवारों को तोड़कर पूरे देश को राष्ट्रीय एकता का एक अनोखा पाठ पढ़ा दिया. बात कर रहे हैं 1977 में रिलीज हुई फिल्म ‘अमर अकबर एंथनी’ की.
भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्में ऐसी होती हैं, जो सिर्फ बॉक्स ऑफिस पर कमाई नहीं करतीं, बल्कि दर्शकों के दिलों में हमेशा के लिए ‘कल्ट स्टेटस’ हासिल कर लेती हैं. साल 1977 में रिलीज हुई निर्देशक मनमोहन देसाई की फिल्म ‘अमर अकबर एंथनी’ भी एक ऐसी ही अमर कृति है. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस महा-ब्लॉकबस्टर फिल्म की नींव एक शाम के अखबार में छपी एक बेहद छोटी और दुखद खबर पर टिकी थी.
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दरअसल, निर्देशक मनमोहन देसाई एक शाम अपने घर पर अखबार पढ़ रहे थे. तभी उनकी नजर एक दिल दहला देने वाली खबर पर पड़ी. खबर ‘जैक्सन’ नाम के एक अत्यधिक शराबी व्यक्ति की थी, जो अपनी गरीबी और बदहाल जिंदगी से इस कदर तंग आ चुका था कि उसने एक खौफनाक कदम उठाने का फैसला किया. वह अपने तीन मासूम बच्चों को कार में बैठाकर एक पार्क में ले गया और उन्हें वहीं लावारिस छोड़कर चला गया.
अखबार की यह खबर यहीं खत्म हो गई, लेकिन मनमोहन देसाई के रचनात्मक दिमाग में विचार की एक नई चिंगारी सुलग उठी. उन्होंने सोचा कि इसके आगे क्या हुआ होगा? उन्होंने इस वास्तविक घटना को अपने खास सिनेमाई ‘मसाले’ के साथ ट्विस्ट किया. देसाई साहब ने कहानी से ‘शराबी’ वाले हिस्से को हटा दिया और एक नया मोड़ जोड़ा कि जब पिता पार्क में वापस लौटता है तो उसके तीनों बच्चे वहां से गायब हो चुके होते हैं. फिल्म में आगे चलकर बड़े बेटे को एक हिंदू पुलिस अधिकारी, दूसरे को एक मुस्लिम दर्जी और तीसरे को एक कैथोलिक पादरी गोद लेता है. यही से भारतीय सिनेमा को ‘अमर’, ‘अकबर’ और ‘एंथनी’ मिले.
यह आइडिया इतना पावरफुल था कि फिल्म की कहानी ने पूरे देश को अपनी ओर खींच लिया. फिल्म की कहानी मनमोहन देसाई की पत्नी जीवनप्रभा एम देसाई ने लिखी थी. स्क्रीप्ट प्रयाग राज और के.के. शुक्ला की और फिल्म के डायलॉग्स कादर खान ने लिखे. यह मनमोहन देसाई की पहली स्वतंत्र रूप से प्रोड्यूस की गई फिल्म थी, जो एम.के.डी. फिल्मस के बैनर तले बनी.
फिल्म की सफलता का एक बड़ा राज इसका शानदार कास्ट था. अमिताभ बच्चन ने एंथनी गोंजाल्वेस का रोल प्ले किया, जो फिल्म का सबसे यादगार किरदार बन गया. विनोद खन्ना ने इंस्पेक्टर अमर खन्ना, ऋषि कपूर ने अकबर इलाहाबादी और बाकी रोल्स में परवीन बाबी, नीतू सिंह, शबाना आजमी, प्राण, निरूपा रॉय, जीवान और रंजीत जैसे दिग्गज शामिल थे. छोटे रोल्स में भी जैसे बॉडीगार्ड जबिस्को ने कल्ट स्टेटस हासिल किया.
फिल्म में हर किरदार के पहनावे पर काफी ध्यान दिया गया था, विशेषकर ऋषि कपूर के ‘अकबर इलाहाबादी’ के किरदार पर. फिल्म में कव्वाली गायक बने ऋषि कपूर ने जितने भी चमकदार और रंग-बिरंगे कपड़े पहने थे, वे किसी महंगे डिजाइनर स्टोर से नहीं खरीदे गए थे. आईएमबीडी ट्रीविया के मुताबिक, इन कपड़ों को मुंबई के बांद्रा इलाके में स्थित मशहूर ‘लिंकिंग रोड’ के फुटपाथ और स्ट्रीट मार्केट से बेहद मामूली कीमतों पर खरीदा गया था, जिसने पर्दे पर अकबर के किरदार को बेहद जीवंत और आम जनता से जुड़ा हुआ बना दिया.
लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का म्यूजिक फिल्म का जान था. आनंद बक्शी के बोलों वाली गाने जैसे ‘पर्दा है पर्दा’, ‘हमको तुमसे हो गया है प्यार’, ‘माई नेम इज एंथनी गोंजाल्वेस’ सुपरहिट रहे. फिल्म का मशहूर गाना ‘पर्दा है पर्दा’ का भी एक रोचक किस्सा है. इस गाने को संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने तैयार किया था. इस गाने में एक लाइन अमिताभ बच्चन पर फिल्माई गई थी. इस लाइन को गाने के लिए म्यूजिक डायरेक्टर्स ने सबसे पहले किशोर कुमार के पास जाकर बात की. लेकिन किशोर कुमार इस छोटे से रोल के लिए गाने को तैयार नहीं हुए. उन्होंने इतनी ज्यादा फीस मांगी कि खुद म्यूजिक डायरेक्टर्स के ही पैर उखड़ गए. इसके बाद, किशोर कुमार के बेटे अमित कुमार ने यह लाइन गाई और उनकी फीस भी बहुत कम थी. गौर करने वाली बात यह है कि अमित कुमार को इस गाने में कोई ऑफिशियल क्रेडिट नहीं मिला.
मल्टीस्टारर इस फिल्म ने न केवल भारत में सफलता के झंडे गाड़े, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी तहलका मचाया था. ये करीब 1 करोड़ के बजट में तैयार हुई थी और फिल्म ने भारत में 7.25 करोड़ का कारोबार किया किया था. फिल्म ने दुनियाभर में 15 करोड़ से ज्यादा की कमाई की थी. यह फिल्म सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रही. इसे वेस्टइंडीज के में भी खूब प्यार मिला. इस फिल्म की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मुख्य कलाकारों के अलावा इसके बेहद छोटे किरदारों, जैसे कि विलेन का बॉडीगार्ड ‘जबिस्को’ को भी दर्शकों ने सिर-आंखों पर बिठाया और वह नाम भी आज एक कल्ट बन चुका है.


